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Friday, 28 December 2018

तमन्ना की कहानियाँ Part 4

December 28, 2018 0
तमन्ना की कहानियाँ Part 4

तमन्नाकी कहानियाँ




क़ासिम दबे पांव शहज़ादी के खेमे के पास आया, हालांकि दबे पांव आने की जरूरत न थी।

उस सन्नाटे में वह दौड़ता हुआ चलता तो भी किसी को खबर न होती। उसने ख़ेमे से कान लगाकर सुना, किसी की आहट न मिली। इत्मीनान हो गया।

 तब उसने कमर से चाकू निकाला और कांपते हुए हाथों से खेमे की दो-तीन रस्सियां काट डालीं। अन्दर जाने का रास्ता निकल आया। उसने अन्दर की तरफ़ झांका। एक दीपक जल रहा था।

 दो बांदियां फ़र्श पर लेटी हुई थीं और शहज़ादी एक मख़मली गद्दे पर सो रही थी। क़ासिम की हिम्मत बढ़ी। वह सरककर अन्दर चला गया, और दबे पांव शहजादी के क़रीब जाकर उसके दिल-फ़रेब हुस्न का अमृत पीने लगा।

उसे अब वह भय न था जो ख़ेमे में आते वक्त हुआ था। उसने जरूरत पड़ने पर अपनी भागने की राह सोच ली थी।

क़ासिम एक मिनट तक मूरत की तरह खड़ा शहजादी को देखता रहा। काली-काली लटें खुलकर उसके गालों को छिपाये हुए थी।

गोया काले-काले अक्षरों में एक चमकता हुआ शायराना खयाल छिपा हुआ था। मिट्टी की अस दुनिया में यह मजा, यह घुलावट, वह दीप्ति कहां? कासिम की आंखें इस दृश्य के नशे में चूर हो गयीं। उसके दिल पर एक उमंग बढाने वाला उन्माद सा छा गया, जो नतीजों से नहीं डरता था।

 उत्कण्ठा ने इच्छा का रूप धारण किया। उत्कण्ठा में अधिरता थी और आवेश, इच्छा में एक उन्माद और पीड़ा का आनन्द।

उसके दिल में इस सुन्दरी के पैरों पर सर मलने की, उसके सामने रोने की, उसके क़दमों पर जान दे देने की, प्रेम का निवेदन करने की , अपने गम का बयान करने की एक लहर-सी उठने लगी वह वासना के भवंर मे पड़ गया।



तमन्ना की कहानियाँ Part 3

December 28, 2018 0
तमन्ना की कहानियाँ  Part 3

तमन्ना की कहानियाँ



कासिम उत्सुकता से व्यग्र होकर कभी लेटता था, कभी उठ बैठता था, कभी टहलने लगता था।

 बार-बार दरवाजे पर आकर देखता, लेकिन पांचों ख्व़ाजासरा देंवों की तरह खडें नजर आते थे। क़ासिम को इस वक्त यही धुन थी कि शाहजादी का दर्शन क्योंकर हो।

 अंजाम की फ़िक्र, बदनामी का डर और शाही गुस्से का ख़तरा उस पुरज़ोर ख्वाहिश के नीचे दब गया था।

घड़ियाल ने एक बजाया। क़ासिम यों चौकं पड़ा गोया कोई  अनहोनी बात हो गयी। जैसे कचहरी में बैठा हुआ कोई फ़रियाद अपने नाम की पुकार सुनकर चौंक पड़ता है।
 ओ हो, तीन घंटों से सुबह हो जाएगी। खेमे उखड़ जाएगें। लश्कर कूच कर देगा। वक्त तंग है, अब देर करने की, हिचकचाने की गुंजाइश नहीं।
कल दिल्ली पहुँच जायेंगे। आरमान दिल में क्यों रह जाये, किसी तरह इन हरामखोर ख्वाजासराओं को चकमा देना चाहिए। उसने बाहर निकल आवाज़ दी-मसरूर।

--हुजूर, फ़रमाइए।

--होशियार हो न?

-हुजूर पलक तक नहीं झपकी।

-नींद तो आती ही होगी, कैसी ठंड़ी हवा चल रही है।

-जब हुजूर ही ने अभी तक आराम नहीं फ़रमाया तो गुलामों को क्योंकर नींद आती।

-मै तुम्हें कुछ तकलीफ़ देना चाहता हूँ।

-कहिए।

-तुम्हारे साथ पांच आदमी है, उन्हें लेकर जरा एक बार लश्कर का चक्कर लगा आओ। देखो, लोग क्या कर रहे हैं। अक्सर सिपाही रात को जुआ खेलते हैं। बाज आस-पास के इलाक़ों में जाकर ख़रमस्ती किया करते हैं। जरा होशियारी से काम करना।

मसरूर- मगर यहां मैदान खाली हो जाएगा।

क़ासिम- मे तुम्हारे आने तक खबरदार रहूँगा।

मसरूर- जो मर्जी हुजूर।

क़ासिम- मैने तुम्हें मोतबर समझकर यह ख़िदमत सुपुर्द की है, इसका मुआवजा इंशाअल्ला तुम्हें साकर से अता होगा।

मसरूम ने दबी ज़बान से कहा-बन्दा आपकी यह चालें सब समझता है। इंशाअल्ला सरकार से आपको भी इसका इनाम मिलेगा। और तब जोर बोला-आपकी बड़ी मेहरबानी है।

एक लम्हें में पॉँचों ख्वाजासरा लश्कर की तरफ़ चले। क़ासिम ने उन्हें जाते देखा। मैदान साफ़ हो गया। अब वह बेधड़क खेमें में जा सकता था।

 लेकिन अब क़ासिम को मालूम हुआ कि अन्दर जाना इतना आसान नहीं है जितना वह समझा था। गुनाह का पहलू उसकी नजर से ओझल हो गया था। अब सिर्फ ज़ाहिरी मुश्किलों पर निगाह थी।



Thursday, 27 December 2018

तमन्ना की कहानियाँ Part 2

December 27, 2018 0
तमन्ना की कहानियाँ Part 2

तमन्ना की कहानियाँ



आधी रात गुजर चुकी थी, लश्कर के आदमी मीटी नींद सो रहे थे। चारों तरफ़ मशालें जलती थीं और तिलासे के जवान जगह-जगह बैठे जम्हाइयां लेते थे।

लेकिन क़ासिम की आंखों में नींद न थी। वह अपने लम्बे-चौड़े  पुरलुत्फ़ ख़ेमे में बैठा हुआ सोच रहा था—क्या इस जवान औरत को एक नजर देख लेना  कोई  बड़ा गुनाह है?

माना कि  वह मुलतान के राजा की शहजादी है और  मेरे बादशाह अपने हरम को उससे रोशन करना चाहते हैं लेकिन मेरी आरजू तो सिर्फ इतनी  है कि उसे एक निगाह देख लूँ  और वह भी इस तरह कि किसी को खबर न हो।

बस। और मान लो यह गुनाह भी हो तो मैं इस वक्त वह गुनाह करूँगा। अभी हजारों बेगुनाहों को इन्हीं हाथों से क़त्ल कर आया हूँ। क्या खुदा के दरबार में गुनाहों की माफ़ी सिर्फ़ इसलिए हो जाएगी कि बादशाह के हुक्म से किये गये? कुछ भी हो, किसी नाज़नीन को एक नजर देख लेना किसी की जान लेने से बड़ा गुनाह नहीं। कम से कम मैं ऐसा नहीं समझता।

क़ासिम दीनदार नौजवान था। वह देर तक इस काम के नैतिक  पहलू पर ग़ौर करता रहा। मुलतान  को फ़तेह  करने वाला हीरो दूसरी बाधाओं  को क्यों खयाल में लाता?

उसने अपने खेमे से बाहर निकलकर देखा, बेगमों के खेमे थोड़ी ही दूर पर गड़े हुए थे। क़ासिम ने तजान-बूझकर अपना खेमा उसके पास लगाया था।

 इन खेमों के चारों तरफ़ कई मशालें जल रही थीं और पांच हब्शी ख्वाजासरा रंगी तलवारें लिये टहल रहे थे। कासिम आकर मसनद पर लेट गया और सोचने लगा

—इन कम्बख्त़ों को क्या नींद न आयेगी? और चारों तरफ़  इतनी मशाले क्यों जला रक्खी हैं? इनका गुल होना जरूरी है।

इसलिए पुकारा—मसरूर।
-हुजुर, फ़रमाइए?
-मशालें बुझा दो, मुझे नींद नहीं आती।
-हुजूर, रात अंधेरी है।
-हां।
-जैसी हुजूर की मर्जी।

ख्व़ाजासरा चला गया और एक पल में सब की सब मशालें गुल हो गयीं, अंधेरा छा गया।

 थोड़ी देर में एक औरत शहजादी के खेमे से निकलकर पूछा-मसरूम, सरकमार पूछती हैं, यह मशालें क्यों बुझा दी गयीं?

मशरूम बोला-सिपहदार साहब की मर्जी। तुम लोग होशियार रहना, मुझे उनकी नियत साफ़ नहीं मालूम होती।


तमन्ना की कहानियाँ Part 1

December 27, 2018 0
तमन्ना की कहानियाँ Part 1

तमन्ना की कहानियाँ




बहादुर, भाग्यशाली क़ासिम मुलतान की लड़ाई जीतकर घमंउ के नशे से चूर चला आता था।

 शाम हो गयी थी, लश्कर के लोग आरामगाह की तलाश मे नज़रें दौड़ाते थे, लेकिन क़ासिम को अपने नामदार मालिक की ख़िदमत में पहुंचन का शौक उड़ाये लिये आता था।

उन तैयारियों का ख़याल करके जो उसके स्वागत के लिए दिल्ली में की गयी होंगी, उसका दिल उमंगो से भरपूर हो रहा था। सड़कें बन्दनवारों और झंडियों से सजी होंगी, चौराहों पर नौबतखाने अपना सुहाना राग अलापेंगे, ज्योंहि मैं सरे शहर  के अन्दर दाखिल हूँगा।

 शहर में शोर मच जाएगा, तोपें  अगवानी के लिए जोर-शोर से अपनी आवाजें बूलंद करेंगी।

 हवेलियों के झरोखों पर शहर की चांद जैसी सुन्दर स्त्रियां ऑखें  गड़ाकर मुझे देखेंगी और मुझ पर फूलों की बारिश करेंगी। जड़ाऊ हौदों पर दरबार के लोग मेरी अगवानी को आयेंगे।

इस शान से दीवाने खास तक जाने के बद जब मैं अपने हुजुर की ख़िदमत में पहुँचूँगा तो वह बॉँहे खोले हुए मुझे सीने से लगाने के लिए उठेंगे और मैं बड़े आदर से उनके पैरों को चूम लूंगा।

आह, वह शुभ घड़ी कब आयेगी? क़ासिम मतवाला हो गया, उसने अपने चाव की बेसुधी में घोड़े को एड़ लगायी।कासिम लश्कर के पीछे था। घोड़ा एड़ लगाते ही आगे बढा, कैदियों का झुण्ड पीछे छूट गया।

घायल सिपाहियों की डोलियां पीछे छूटीं, सवारों का दस्ता पीछे रहा। सवारों के आगे मुलतान के राजा की बेगमों और मैं उन्हें और शहजादियों की पनसें और सुखपाल थे।

 इन सवारियों के आगे-पीछे हथियारबन्द ख्व़ाजासराओं की एक बड़ी जमात थी।

 क़ासिम  अपने रौ में घोड़ा बढाये चला आता था। यकायक उसे एक सजी हुई पालकी में से दो आंखें झांकती हुई नजर आयीं।

क्रासिंग ठिठक गया, उसे मालूम हुआ कि मेरे हाथों के तोते उड़ गये, उसे अपने दिल में एक कंपकंपी, एक कमजोरी और बुद्धि पर एक उन्माद-सा  अनुभव हुआ। उसका आसन खुद-ब-खुद ढ़ीला पड़ गया। तनी हुई गर्दन झुक गयी।

 नजरें नीची हुईं। वह दोनों आंखें दो चमकते और नाचते हुए सितारों की तरह, जिनमें जादू का-सा आकर्षण था,

उसके आदिल के गोशे में बैठीं। वह जिधर ताकता था वहीं दोनों उमंग की रोशनी से चमकते हुए तारे नजर आते थे।

 उसे बर्छी नहीं लगी, कटार नहीं लगी, किसी ने उस पर जादू नहीं किया, मंतर नहीं किया, नहीं उसे अपने दिल में इस वक्त एक मजेदार बेसुधी, दर्द की एक लज्जत, मीठी-मीठी-सी एक कैफ्रियत और एक सुहानी चुभन से भरी हुई रोने की-सी हालत महसूस हो रही थी।

उसका रोने को जी चाहता था, किसी दर्द की पुकार सुनकर शायद वह रो पड़ता, बेताब  हो जाता। उसका दर्द का एहसास जाग उठा था जो इश्क की पहली मंजिल है।

क्षण-भर बाद उसने हुक्म दिया—आज हमारा यहीं कयाम होगा।


राव मालदेव - दासी भारमली Part2

December 27, 2018 0
राव मालदेव - दासी भारमली Part2
राव मालदेव - दासी भारमली






बारहट जी (कवि आशानन्द जी) ने अपने मन में अपने कहे गए शब्दों पर विचार किया और बहुत पछताए भी लेकिन वे शब्द वापस कैसे लिए जा सकते थे ।
आपने जोधपुर की रूठी रानी के बारे में पढ़ते हुए उसकी दासी भारमली का नाम भी पढ़ा होगा ।

 जैसलमेर की राजकुमारी उमादे जो इतिहास में रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध है अपनी इसी रूपवती दासी भारमली के चलते ही अपने पति जोधपुर के शक्तिशाली शासक राव मालदेव से रूठ गई थी और मालदेव के लाख कोशिश करने के बाद भी वह आजीवन अपने पति से रूठी ही रही ।

जोधपुर के राव मालदेव का विवाह जैसलमेर के रावल लूणकरणजी की राजकुमारी उमादे के साथ हुआ था । सुहागरात्रि के समय उमादे को श्रृंगार करते देर हो गई तो उसने अपनी दासी भारमली को कुछ देर के लिए मालदेव जी का जी बहलाने के लिए भेजा । भारमली इतनी सुन्दर थी कि उसके रूप लावण्य को देख नशे में धुत मालदेव जी अपने आप को न बचा सके ।

श्रृंगार करने के बाद जब उमादे आई और उसने मालदेव जी भारमली के साथ देखकर यह कहकर वापस चली गयी कि ये पति मेरे लायक नहीं है । और वो जीवन भर रूठी ही रही । राव मालदेव ने जोधपुर आने के बाद अपने एक कवि आशानन्द जी बारहट को रानी को मनाने भेजा पर वे भी रानी मनाने में असमर्थ रहे । इस पर कवि आशानन्द जी बारहट ने जैसलमेर के रावत लूणकरणजी से कहा कि अपनी पुत्री का भला चाहते है तो दासी भारमली को जोधपुर से वापस बुलवा लीजिए ।

रावत लूणकरण जी ने एसा ही किया और भारमली को उन्होंने जोधपुर से जैसलमेर बुलवा भेजा पर स्वयम लूणकरण जी भारमली के रूप और लावण्य पर मुग्ध हो गए जिससे लूणकरण जी की दोनों रानियाँ ने परेशान होकर भारमली को जैसलमेर से हटाने की सोची । लूणकरण जी की पहली रानी सोढ़ी जी ने उमरकोट अपने भाइयों से भारमली को ले जाने के लिए कहा लेकिन उमरकोट के सोढों ने लूणकरण जी से इस बात पर शत्रुता लेना उचित नहीं समझा ।तब लूणकरण जी की दूसरी रानी जो जोधपुर के मालानी परगने के कोटडे के शासक बाघ जी राठौड़ की बहन थी ने अपने भाई बाघ जी को बुलाया ।

बहन का दुःख मिटाने हेतु बाघजी शीघ्र आये और रानियों के कथनानुसार भारमली को ऊंट पर बैठकर जैसलमेर से छिपकर भाग आये । लूणकरण जी कोटडे पर हमला तो कर नहीं सकते थे क्योंकि पहली बात तो ससुराल पर हमला करने में उनकी प्रतिष्ठा घटती और दूसरी बात राव मालदेव जैसा शक्तिशाली शासक मालानी का संरक्षकथा । अत: रावत लूणकरण जी ने जोधपुर के ही कवि आशानन्द जी बारहट को कोटडा भेजा कि बाघजी को समझाकर भारमली को वापस ले आये ।

दोनों रानियों ने बाघ जी को पहले ही सन्देश भेजकर सूचित कर दिया कि वे बारहट जी की बातों में न आना । जब बारहट जी कोटडा पहुंचे तो बाघजी ने उनका बड़ा स्वागत सत्कार किया और बारहट जी की इतनी खातिरदारी की कि वे अपने आने का उद्देश्य ही भल गए । एक दिन बाघजी शिकार पर गए ,बारहट जी व भारमली भी साथ थे । भारमली व बाघजी में असीम प्रेम हो गया था अत: वह भी किसी भी हालत में बाघजी को छोड़कर जैसलमेर नहीं जाना चाहती थी । शिकार के बाद भारमली ने सूलें सेंक कर खुद विश्राम स्थल पर बारहट जी दी व शराब आदि भी पिलाई । इससे खुश होकर व बाघजी व भारमली के बीच प्रेम देखकर बारहट जी का भावुक-कवि- हृदय बोल उठा
जंह गिरवर तंह मोरिया, जंह सरवर तंह हंस ।
जंह बाघा तंह भारमली ,जंह दारु तंह मंस ।

अर्थात जहाँ पहाड़ होते है वहां मोर होते है ,जहाँ सरवर होता है वहां हंस होते है इसी प्रकार जहाँ बाघ जी है वहीँ भारमली होगी ठीक उसी तरह जिस तरह जहाँ दारू होती है वहां मांस भी होता है ।

बारहट की यह बात सुन बाघजी ने झट से कह दिया ,बारहट जी आप बड़े है और बड़े आदमी दी हुई वास्तु को वापिस नहीं लेते अत: अब भारमली को मुझसे न मांगना । आशानन्द जी बारहट पर वज्रपात सा हो गया लेकिन बाघजी ने बात सँभालते हुए कहा - कि आपसे एक प्रार्थना और है आप भी मेरे यहीं रहिये ।

और इस तरह से बाघजी ने कवि आशानन्द जी बारहट को मनाकर भारमली को जैसलमेर ले जाने से रोक लिया । आशानन्द जी भी कोटडा रहे और उनकी व बाघजी जी की भी इतनी घनिष्ट दोस्ती हुई कि वे जिन्दगी भर बाघजी को भुला ना पाए । एक दिन अकस्मात बाघजी का निधन हो गया , भारमली बाघजी के शव के साथ चिता में बैठकर सती हो गई और आशानन्द जी अपने मित्र बाघजी की याद में जिन्दगी भर बैचेन रहे और उन्होंने बाघजी की स्मृति में अपने उदगारों के पीछोले बनाये ।

बाघजी और कवि आशानंद जी के बीच इतनी घनिष्ट मित्रता हुई कि आशानन्द जी सोते उठते बाघजी का नाम ही लेते थे एक बार उदयपुर के महाराणा ने कवि आशानन्द जी की परीक्षा लेने के लिए कहा कि वे सिर्फ एक रात बाघजी का नाम लिए बिना निकाल दे तो मैं आपको चार लाख रूपये दूंगा । कवि पुत्र ने भरपूर कोशिश की कि कवि पिता अपने मित्र बाघजी का नाम कम से कम एक रात्री तो न ले पर कवि मन कहाँ चुप रहने वाला था ।

Tuesday, 25 December 2018

बणी-ठणी राजस्थान की मोनालिसा Part2

December 25, 2018 0
बणी-ठणी राजस्थान की मोनालिसा Part2
बणी-ठणी राजस्थान की मोनालिसा





इस चित्र की सर्वत्र बहुत प्रसंशा हुई और उसके बाद दासी का नाम बणी-ठणी पड़ गया। सब उसे बणी-ठणी के नाम से ही संबोधित करने लगे। चितेरे राजा के अलावा उनके चित्रकार को भी अपनी चित्रकला के हर विषय में राजा की प्रिय दासी बणी-ठणी ही आदर्श मोडल नजर आने लगी और उसने बणी-ठणी के ढेरों चित्र बनाये। जो बहुत प्रसिद्ध हुए और इस तरह किशनगढ़ की चित्रशैली को बणी-ठणी के नाम से ही जाना जाने लगा।

और आज किशनगढ़ कि यह बणी-ठणी चित्रकला शैली पुरे विश्व में प्रसिद्ध है। बणी-ठणी का पहला चित्र तैयार होने का समय संवत 1755-57 है। आज बेशक राजा द्वारा अपनी उस दासी पर आसक्ति व दोनों के बीच प्रेम को लेकर लोग किसी भी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करे या विश्लेषण करें पर किशनगढ़ के चित्रकारों को के लिए उन दोनों का प्रेम वरदान सिद्ध हुआ है क्योंकि यह विश्व प्रसिद्ध चित्रशैली भी उसी प्रेम की उपज है और इस चित्रशैली की देश-विदेश में अच्छी मांग है।

किशनगढ़ के अलावा भी राजस्थान के बहुतेरे चित्रकार आज भी इस चित्रकला शैली से अच्छा कमा-खा रहें है यह चित्रकला शैली उनकी आजीविका का अच्छा साधन है।
बणी-ठणी सिर्फ रूप और सौंदर्य की प्रतिमा व राजा की प्रेमिका ही नहीं थी वह एक अच्छी गायिका व कवयित्री थी। उसके इस साहित्यक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार सौभाग्य सिंह शेखावत लिखते है-
राजकुलीय परिवारों की राणियों महारानियों की भांति ही राजा महाराजाओं के पासवानों, पड़दायतों और रखैलों में कई नारियाँ अच्छी साहित्यकार हुई है। किशनगढ़ के ख्यातिलब्ध साहित्यकार महाराजा सावंतसिंह की पासवान बनीठनी उत्तम कोटि की कवयित्री और भक्त-हृदया नारी थी।

अपने स्वामी नागरीदास (राजा सावंत सिंह) की भांति ही बनीठनी की कविता भी अति मधुर, हृदय स्पर्शी और कृष्ण-भक्ति अनुराग के सरोवर है। वह अपना काव्य नाम रसिक बिहारी रखती थी। रसिक बिहारी का ब्रज, पंजाबी और राजस्थानी भाषाओँ पर सामान अधिकार था। रसीली आँखों के वर्णन का एक पद उदाहरणार्थ प्रस्तुत है-

रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ ।
प्रेम छकी रस बस अलसारणी, जाणी कमाल पांखड़ियाँ ।
सुन्दर रूप लुभाई गति मति हो गई ज्यूँ मधु मांखड़ियाँ।
रसिक बिहारी वारी प्यारी कौन बसि निसि कांखड़ियाँ।।

रसिक प्रिया ने श्रीकृष्ण और राधिका के जन्म, कुञ्ज बिहार, रास-क्रीड़ा, होली, साँझ, हिंडोला, पनघट आदि विविध लीला-प्रसंगों का अपने पदों में वर्णन किया है। कृष्ण राधा लीला वैविध की मार्मिक अभिव्यक्ति पदों में प्रस्फुटित हुई है।

बणी-ठणी राजस्थान की मोनालिसा Part1

December 25, 2018 0
बणी-ठणी राजस्थान की मोनालिसा Part1
बणी-ठणी राजस्थान की मोनालिसा




राजस्थान के इतिहास में राजा-रानियों आदि ने ही नहीं बल्कि तत्कालीन शाही परिवारों की दासियों ने भी अपने अच्छे बुरे कार्यों से प्रसिद्धि पायी है।

जयपुर की एक दासी रूपा ने राज्य के तत्कालीन राजनैतिक झगडों में अपने कुटिल षड्यंत्रों के जरिये राजद्रोह जैसे घिनोने, लज्जाजनक और निम्नकोटि के कार्य कर इतिहास में कुख्याति अर्जित की तो उदयपुर की एक दासी रामप्यारी ने मेवाड़ राज्य के कई तत्कालीन राजनैतिक संकट निपटाकर अपनी राज्य भक्ति, सूझ-बुझ व होशियारी का परिचय दिया और मेवाड़ के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखवाने में सफल रही। पूर्व रियासत जोधपुर राज्य की एक दासी भारमली भी अपने रूप और सौंदर्य के चलते इतिहास में चर्चित और प्रसिद्ध है।

बणी-ठणी भी राजस्थान के किशनगढ़ रियासत के तत्कालीन राजा सावंत सिंह की दासी व प्रेमिका थी। राजा सावंत सिंह सौंदर्य व कला की कद्र करने वाले थे वे खुद बड़े अच्छे कवि व चित्रकार थे। उनके शासन काल में बहुत से कलाकारों को आश्रय दिया गया।

बणी-ठणी भी सौंदर्य की अदभुत मिशाल होने के साथ ही उच्च कोटि की कवयित्री थी। ऐसे में कला और सौंदर्य की कद्र करने वाले राजा का अनुग्रह व अनुराग इस दासी के प्रति बढ़ता गया। राजा सावंतसिंह व यह गायिका दासी दोनों कृष्ण भक्त थे। राजा की अपनी और आसक्ति देख दासी ने भी राजा को कृष्ण व खुद को मीरां मानते हुए राजा के आगे अपने आपको पुरे मनोयोग से पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया।

उनकी आसक्ति जानने वाली प्रजा ने भी उनके भीतर कृष्ण-राधा की छवि देखी और दोनों को कई अलंकरणों से नवाजा जैसे- राजा को नागरीदास, चितवन, चितेरे,अनुरागी, मतवाले आदि तो दासी को भी कलावंती, किर्तिनिन, लवलीज, नागर रमणी, उत्सव प्रिया आदि संबोधन मिले वहीं रसिक बिहारी के नाम से वह खुद कविता पहले से ही लिखती थी।

एक बार राजा सावंतसिंह ने जो चित्रकार थे इसी सौंदर्य और रूप की प्रतिमूर्ति दासी को राणियों जैसी पौशाक व आभूषण पहनाकर एकांत में उसका एक चित्र बनाया। और इस चित्र को राजा ने नाम दिया बणी-ठणी । राजस्थानी भाषा के शब्द बणी-ठणी का मतलब होता है सजी-संवरी,सजी-धजी ।राजा ने अपना बनाया यह चित्र राज्य के राज चित्रकार निहालचंद को दिखाया। निहालचंद ने राजा द्वारा बनाए उस चित्र में कुछ संशोधन बताये।

संशोधन करने के बाद भी राजा ने वह चित्र सिर्फ चित्रकार के अलावा किसी को नहीं दिखाया। और चित्रकार निहालचंद से वह चित्र अपने सामने वापस बनवाकर उसे अपने दरबार में प्रदर्शित कर सार्वजानिक किया। इस सार्वजनिक किये चित्र में भी बनते समय राजा ने कई संशोधन करवाए व खुद भी संशोधन किये।